इंडिया शाइनिंग से चमका विज्ञापन ऊद्योग





By  नीरज बाजपेयी   On   

इंडिया शाइनिंग के नारे ने वाजपेयी सरकार को भले ही धोखा दे दिया हो लेकिन विज्ञापन उद्योग को इसने चमका दिया है और यह उद्योग इस वर्ष 10 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर दस हजार करोड रुपए से अधिक का हो जाएगा1 वैश्वीकरण के एक दशक से अधिक होने और नए नए चैनलों के आने के बाद भी विज्ञापन उद्योग की मन माफिक तरक्की नहीं हो रही थी और दो वर्ष पहले तक तो इसकी वृद्धि दर पांच प्रतिशत से आगे बढ ही नहीं रही थी लेकिन समाप्त वित्त वर्ष मे विज्ञापन उद्योग साढे नौ फीसदी की दर से बढा और वर्ष 2004.05 मे यह 10 प्रतिशत के आकडे को पार कर जाएगा1 ...... वित्त वर्ष 2003..04 मे देश मे विज्ञापन खर्च 9400 करोड रुपए से अधिक रहा है जिसमे से टेलीविजन विज्ञापन का हिस्सा 3700 करोड रुपए था यानी प्रिंट मीडिया की हिस्सेदारी अधिक तो है लेकिन यह जल्द ही पिछडने वाली है क्योंकि टीवी चैनलों की संख्या और पहुंच तेजी से बढ रही है1 विज्ञापन कंपनी मैककेन एरिक्सन ने कहा कि विज्ञापन उद्योग मे तेजी के बारे मे आम राय यही है कि अर्थव्यवस्था मे तेजी अगले कुछ वर्षों के लिए अच्छे परिणाम लेकर आएगी1कंपनियों ने विज्ञापन खर्च काफी बढा दिया है क्योंकि आज के दौर मे प्रचार के बिना कोई कंपनी बाजार मे ठहर नहीं सकती1हालांकि विज्ञापन खर्च तभी बढाया जाता है जबकि वास्तविक वृद्धि दिखाई दे .भविष्य मे तेजी के संकेत हों और प्रतियोगिता का जबरदस्त दबाव हो1फिलहाल ये सभी सूचक मौजूद हैं और ब्रांड इंडिया इंक भी स्थापित हो रहा है1 विज्ञापन उद्योग को मंच मुहैया कराने वाले मीडिया उद्योग मे क्रांति जैसी स्थिति है1आर्थिक उदारीकरण और चैनलों की बाढ से विज्ञापन आय की हिस्सेदारी मे सेंधमारी चालू है और बाजार का आकार बढने के साथ हिस्सेदारी मे उलटफेर देखने को मिल रहा है1 मौजूदाहाल देश मे विज्ञापन खर्च जी.डी.पी की तुलना मे मात्र दशमलव चार प्रतिशत है जो विकसित ही नहीं विकास शील देशों की तुलना मे भी कम है1ब्रिटेन मे विज्ञापन खर्च जी.डी.पी के एक प्रतिशत.जर्मनी मे 0.8 जापान मे 1.1 और लातिन अमरीका मे 1.2 प्रतिशत है1 विज्ञापन उद्योग के विपणन नीतिकारों के मुताबिक पिछले एक वर्ष से अर्थव्यवस्था मे चारो ओर जो तेजी का माहौल है उसका भरपूर फायदा विज्ञापन उद्योग को मिला है1विदेशी कंपनियों ने भारतीय बाजार को प्रभावित करने और अपने पैर जमाने के लिए विज्ञापन को मुख्य हथियार बनाया है क्योकि उनके सामने ब्रांड स्थापना की चुनौती थी और उनकी नजर मे देश का काफी बडा उपभोक्ता वर्ग ..अन टच्ड.. था जिसे बाजार तक लाना बहुत मुश्किल नही है1 बीते एक दो वर्षों मे देश मे विज्ञापन उद्योग की वृद्धि दर सकल घरेलू उत्पाद जी.डी.पी की तुलना मे डेढ से दो गुनी अधिक रही है1 उपभोक्तावादी संस्कृति बढने के साथ हर कंपनी के विज्ञापन बजट मे भारी इजाफा हुआ है1पश्चिमी देशों मे भी यह दर दो गुनी है1 विज्ञापन खर्च मे हिस्सेदारी के मामले मे टी.वी का हिस्सा प्रिंट मीडिया से थोडा ही कम है1यह 41 प्रतिशत के बराबर है जबकि प्रिंट का हिस्सा 48 फीसदी है1तीन प्रतिशत हिस्सेदारी रेडियो और सात फीसदी बैनर पोस्टरों की है1भारत दुनिया का दूसरा सबसे बडा बाजार होने बावजूद विज्ञापन खर्च के मामले मे यह दूसरे देशों से पीछे है1 चीन मे टी.वी विज्ञापन खर्च की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत और लातिन अमरीका मे 55 फीसदी है1हालांकि 1996 से देश की प्रतिव्यक्ति आय मे औसतन 6 प्रतिशत के इजाफे की तुलना मे विज्ञापन व्यय 18 प्रतिशत की दर से बढा है1इसी प्रकार पूरा मनोरंजन उद्योग 31 प्रतिशत की दर से बढा है1फिक्की एंडरसन के अध्ययन मे भी इस बात की पुष्टि की गई है1कहा गया है कि मनोरंजन उद्योग एक संगठित उद्योग की शक्ल ले रहा है 1 टी.वी चैनलों की विज्ञापन आय लगातार बढ रही है और कंडीशनल एक्सेस प्रणाली लागू होने के बाद तो इसमे और बढोत्तरी होगी लेकिन प्रिंट मीडिया अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह विज्ञापनों से होने वाली आय पर निर्भर है1इस माध्यम की दो तिहाई से ज्यादा आय विज्ञापन से होती है और क्षेत्रीय होने का इसे फायदा मिलता है1लेकिन अब उपभोक्ता सामग्री बनाने वाला कंपनियां प्रिंट मीडिया के साथ क्षेत्रीय टीवी चैनलों की ओर आकर्षित हो रही हैं1 ....... विज्ञापन उद्योग मे भी कई बडे परिवर्तन हुए है1एक समय था जब दैनिक उपभोक्ता सामग्री बनाने वाली कंपनियों के भरोसे विज्ञापन कंपनियों का कारोबार चलता था1 इस वर्ग के विज्ञापनों की हर माध्यम मे धूम रहती थी किंतु अब स्थिति बदल काफी हद तक बदल गई है1 उदाहरण के तौर पर दो वर्ष पहले बरसात कम होने से दैनिक उपभोक्ता कंननियों का कारोबार प्रभावित हुआ पर इसका असर विज्ञापन कंननियों का सेहत पर नहीं पडा1 नए दौर मे ट्रेंड बदल गया है कार .दुपहिया वाहन.टी.वी. फ्रिज .मोबाइल फोन और सेवा कंपनियां.वित्तीय सेवा और प्रीमियम वर्ग के उत्पादों के विज्ञापन पर कंपनियां भारी मात्रा मे खर्च कर रहीं हैं1दो इलेक्ट्रानिक्स कंपनियों और कोक तथा पेप्सी के बीच की लडाई जग जाहिर है1 विज्ञापन कंपनी ग्रे के विपिन का कहना है कि उपभोक्ताओं की प्राथमिकता के साथ विज्ञापकों की श्रेणियां भी बदल रहीं है1मोबाइल फोन सेवा कंपनियां जो वर्ष 2001 मे 24 वीं बडी विज्ञापनदाता हुआ करतीं थी 2003 मे चौथे स्थान पर आ गईं है1बीते वर्ष इन कंपनियों ने करीब 450 करोड रुपए विज्ञापन पर खर्च किए1रिलायंस.हच और एयर टेल ने सबसे अधिक खर्च किया1 मैककेन एरिक्शन के प्रसून जोशी कहते है कि रेडियो की विज्ञापन आय अभी टीवी और प्रिंट के सामने नगण्य है लेकिन कुछ वर्षों मे स्थिति काफी बदल जाएगी1वह कहते है कि रेडियो को हाल ही मे तो आजादी मिली है इसका विस्तार अभी चल रहा है फिर भी इसका प्रभाव जबरदस्त है1अगले दो वर्षों मे रेडियो संचार का सबसे सशक्त माध्यम हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए1प्रसून मानते है कि रेडियो विज्ञापन की मांग दूसरे माध्यमों की तुलना मे तेजी से बढ रही है1



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